चौधरी बहादुर सिंह भोभिया

Grammothan Vidyapeeth Sangaria

कुल्हाड़े की चोट से विशाल शहतीर टुकड़े-टुकड़े हो जाता है, हथौड़े की चोट से मिस्त्री पुर्जाें को बनाता भी है, तोड़ता भी। घन की चोट से लुहार हठीले लौहपिंड को पीट-पीट कर मनचाही शक्ल दे देता है। एक से एक बड़ी चोट है दुनिया में। पर सब से बड़ी चोट है -शब्द की। द्रौपदी के शब्दों ने महाभारत के युद्ध की रचना कर दी थी। संतकवि ने भी कहा है-सबद की चोट लगी मेरे मन मे, बेधि गयो तन सारो......। संतकवि के अध्यात्म से हट कर भौतिक वातावरण में आये तो भी यही मिलेगा कि हर निर्माण और विध्वंस के पीछे शब्द की चोट होती है। आपके आंखों के समाने शिक्षा की एक विशाल रचना है - ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया। इसका जन्म भी सबद की चोट से हुआ था।

बात शुरू होती है सन् 1882 से। संगरिया के निकटवर्ती गांव बिड़ंगखेड़ा में एक साधारण जाट परिवार में मोती राम भोबिया के घर एक संतान ने जन्म लिया। नाम रखा गया- बहादुर सिंह। इलाके में स्कूल न होने के कारण तत्कालीन रिवाज के अनुसार ननिहाल में गांव के पंडित जी से बहादुर सिंह ने साधारण पत्र-व्यवहार, प्रारंभिक गणित, पहाड़े और वाणिका की शिक्षा प्राप्त की। छोटी आयु में ही बहादुर सिंह की शादी कर दी गई। युवावस्था में बहादुर सिंह सेना में भर्ती हो गये। कुछ समय के सैनिक जीवन ने बहादुर सिंह को अदम्य साहस का धनी, परिश्रमी और दृढव्रती बना दिया। उन्हें सूबेदार का पद भी मिला। बात सन् 1917 की है। हरिद्धार में कुंभ का मेला लगा था। इस इलाके से बहुत से तीर्थयात्री हरिद्धार आ जा रहे थे। रेल से हरिद्धार जाने के लिये अंबाला के स्टेशन पर गाड़ी बदलनी पड़ती थी। बहादुर सिंह भोभिया भी स्वामी मनशानाथ और दूसरे साथियों के साथ हरिद्धार जा रहे थे। अंबाला के स्टेशन पर गाड़ी की प्रतीक्षा की जा रही थी। वहीं एक घटना ने, एक बात ने बहादुर सिंह भोभिया के जीवन का उद्देश्य बदल दिया।

रेलवे स्टेशन के एक कोने में गंगानगर-हनुमानगढ इलाके के लोगों की भीड़ जमा थी। स्वामी मनसानाथ उन लोगों से मिले। पता चला कि ये लोग हरिद्धार जा रहे है। पंद्रह बीस दिन से यहां प्लेटफार्म पर पड़े हैं। स्टेशन के अधिकारी इन्हें गाड़ी में चढने ही नहीं देते। दूसरे लोगों को गाड़ी में बैठा देते है। इन्हें यह भी नहीं पता कि किससे बात करें।

स्वामी मनसानाथ ने वापस आकर बहादुर सिंह से कहा- देख, बहादुर, ये लोग तेरे इलाके के हैं। इन अनपढ और जाहिल लोगों को यह नहीं पता कि हरिद्धार जाने के लिये किस गाड़ी में बैठें , गाड़ी में कैसे जगह प्राप्त करें। बहादुर सिंह उसी समय स्टेशन के अंग्रेज स्टेशन मास्टर के पास गये। उन्हें बताया कि वह एक सैनिक है और उनके इलाके के लोग आपके कर्मचारियों की वजह से परेशान है। स्टेशन मास्टर उनसे प्रभावित हुए। उसी समय उन लोगों के लिये एक स्पेशल ट्रेन में जगह बनाकर उन्हें हरिद्धार भेजा गया।

मामूली लगने वाली इस घटना ने बहादुर सिंह के दिल में एक टीस पैदा कर दी। बहादुर सिंह यही सोचने लगे कि उनके इलाके के लोग अनपढ हैं, इसलिये जाहिल कहलाते हैं। अनपढ और जाहिल हैं इसलिए दूसरों पर निर्भर है , अपनी मदद खुद नहीं कर पाते हैं और कष्ट भोगते हैं।

हरिद्धार में उनका मन अधिक दिन नहीं लगा। वापस आकर उन्होंने संकल्प लिया कि इलाके को अनपढ नहीं रहने दूंगा। इलाके में स्कूल खोलूंगा। इस घटना के तीन -चार महीने बाद उसी वर्ष 9 अगस्त,1917 के दिन बहादुर सिंह भोभिया ने हनुमानगढ़ की एक धर्मशाला में ‘जाट एंग्लो संस्कृत विद्यालय’ की नींव रखदी। दिन और वर्ष दोनों ऐतिहासिक रहे हैं। सन् 1917 में ही रूस में क्रांति हुई थी। 9अगस्त, 1942 को महात्मा गांधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो का उद्घोष किया था। बहादुर सिंह भोभिया ने 9 अगस्त 1917 को अशिक्षा और अज्ञान छोड़ने का न केवल नारा दिया बल्कि स्कूल प्रारंभ कर आधार भी दिया।

हमारे देश में अनेक महापुरूषों ने शिक्षा संस्थाएं स्थापित की है। पर वे सब शहरों में, नदियों के किनारे, पहाड़ों पर या अन्य सुविधाजनक स्थानों पर है। भोभिया जी ने स्कूल ऐसी जगह चलाया जहां सुविधा के नाम पर कुछ नहीं था। जहां नदी, झील या पहाड़ नहीं थे। वहां थे रेत के ऊंचे नीचे टीले, निरंतर चलती रेतीली आंधियाँ। पीने के पानी का घोर अभाव। एक लोटा अश्रुजल मिलना आसान, पर पीने का पानी दुर्लभ। स्कूल ने पेयजल के अभाव का चालीस वर्ष तक मुकाबला किया।

स्कूल तो खुल गया। अशिक्षा के अंधकार से घिरे इस इलाके में पढाने के लिये अध्यापक भी बड़ी मुश्किल से मिला आठवीं पास एक युवक ललिताप्रसाद गोयल स्कूल के पहले अध्यापक बने। पर स्कूल चलाना आसान नहीं था। पढने के प्रति लोगो की घोर अरूचि, अर्थाभाव जैसी मुसीबतें तो थी ही, तत्कालीन जातिगत विद्वेष और रियासती काल की बिरंकुशता भी एक बड़ी बाधा बन गई। रियासत के एक अधिकारी की नाराजगी स्कूल के मार्ग में नई नई अड़चने पैदा करने लगी। बाधाओं का बहादुर सिंह भोभिया ने बड़ी बहादुरी से सामना किया। समविचारक मित्रों की सलाह पर बहादुर सिंह भोभिया ने निर्णण किया कि रियासती अधिकारियों से संघर्ष में समय बरबाद करने की अपेक्षा स्कूल हनुमानगढ की बजाय कहीं और चलाया जावे। उन्होंने हनुमानगढ छोड़ दिया। 21 दिसम्बर, 1917 को स्कूल संगरिया में आ गया। संगरिया हनुमानगढ से 27 किलोमीटर की दूरी पर है।

संगरिया में उस समय हिसारिया धर्मशाला नई-नई बनी थी। स्कूल धर्मशाला में चलने लगा। बहादुरसिंह की लग्न से लोग प्रभावित होने लगे। बहादुर सिंह भोभिया के सेना के दिनों के साथी ठाकुर गोपालसिंह ने, जो इस इलाके के बड़े भू-स्वामी थे, संगरिया स्थित अपनी 14बीघा 3 बिसवा जमीन जाट स्कूल के लिये बहादुर सिंह भोभिया को दान में दे दी। स्वामी मनसानाथ ने भी स्कूल के लिये दान संग्रह किया और संगरिया में ‘जाट एंग्लों संस्कृत स्कूल’’ के लिये अपने कच्चे कोठे बन गये।

स्कूल चल पड़ा। उद्देश्य तो पूरे इलाके को पढाने का था। पास दूर के गांवों मे इसकी शाखाएं स्थापित की गई। मटीली, कुलार, दीनगढ, गोलूवाला एव घमूड़वाली आदि गांवों में पाठशालाओं चलने लगी। स्कूल चलाने के लिये धन-व्यवस्था के लिये बहादुर सिंह भोभिया को एक बार व्रत भी करना पड़ा। उनके इस संकल्प का इलाके के लोगों पर आशातीत प्रभाव हुआ।

स्कूल शुरू करने के बाद बहादुरसिंह अपने परिवार को भूल गये। सन् 1919 में फैली महामारी (कार्तिक मास में फैलने के कारण इलाके में उसे कातक वाली बीमारी कहा जाता है) में उनकी पत्नी, एक पुत्र, दो पुत्रियां और एक बहन काल का ग्रास बन गये। उनका छोटा भाई 17 वर्ष की आयु में एक पुत्री और पत्नी को छोड़ कर काल-कवलित हो गया। अब घर पर थे उनकी वृद्धा माता लिछमा, एक पुत्र शत्रुघ्न और भाई की विधवा तथा बेटी। कार्तिक की बीमारी में अपने परिवार के एक साथ चार सदस्यों को खोकर बहादुर सिंह भोभिया घर के प्रति और उदासीन हो गये। उनके परिवार का पालन-पोषण, खेती का काम उनकी वृद्धा माता संभालती थी। वृद्धा का इकलौता बेटा घरबार छोड़कर इलाके को शिक्षित करने की तपस्या कर रहा था, भविष्य की अनेक शिक्षा संस्थाओं की नींव को मजबूत कर रहा था।

आखिर एक दिन 1 जून 1924 को वह क्रूर काल आ गया जिसके पंजे से कोई नहीं बच सकता। 15-20 दिन तक टायफायड से पीड़ित रहकर यह फौलादी इंसान स्कूल रूपी पौधे को शैशवावस्था में ही सदा के लिये छोड़ गया। पौधा मुरझाया नहीं । उसे स्वामी केशवानंद जैसे तपस्वी का संरक्षण प्राप्त हुआ।

परंतु स्वामी केशवानंद का वरद-हस्त भी ग्रामोत्थान विद्यापीठ को अकारण प्राप्त नहीं हुआ था। शब्द की चोट ने ही स्वामी केशवानंद जी को अबोहर-फाजिल्का के इलाके से संगरिया में आने को विवश किया। चौ.बहादुर सिंह भोभिया की मृत्यु के बाद आगामी सात वर्षाें तक चौधरी हरिश्चंन्द्र नैण ने स्कूल के काम को आगे बढाया पर बढते व्यय भार से उनके भी हाथ -पांव फूल गये। स्कूल भवनों की स्थिति दिन ब दिन खराब होती जा रही थी। संचालकगण स्कूल को बंद करने का मन बना चुके थे। इस निर्णय की घोषणा के लिये इलाके के गणमान्य व्यक्तियों की एक सभा बुलाई गई। सभा में इलाके के और दूर के भी लोग उपस्थित हुए। स्कूल की दशा-दुर्दशा का सविस्तार विवरण प्रस्तुत किया गया। सभा में स्वामी केशवानंद को भी बुलाया गया था। उन दिनों स्वामी केशवानंद अपने अबोहर क्षेत्र के कार्याे की वजह से बालसूर्य की भांति चमक रहे थे। सबकी निगाह उनकी ओर थी। सभा में प्रस्ताव रखा गया कि स्कूल बंद कर दिया जावे और इसके कच्चे भवनों का उपयोग केवल छात्रावास के रूप मे किया जावे। प्रस्ताव का विरोध करने का साहस किसी ने नहीं दिखाया। अज्ञानांधकार मिटाने के लिये 15 वर्ष पूर्व जलाई गई ज्योति बुझाने से रोकता कौन? जो रोकता उसे, इस ज्योति को प्रज्वलित रखने की जिम्मेवारी लेनी पड़ती। स्कूल बंद करने की घोषणा के शब्दों ने स्वामी केशवानंद के हृदय पर चोट की। उन्होंने उसी समय सिंह गर्जना की-

‘‘भले आदमियों , स्कूल बंद करना ही था तो मुझे क्यों बुलाया? क्या स्कूल इसलिये खोला जाता है कि उसे बाद में बंद कर दिया जावे?’’ इस बात को स्वामीजी अपने शब्दों में बताया करते थे-

‘‘जाट विद्यालय, संगरिया के प्रारंभ के जन्मदाता और पोषक एक-एक करके स्वर्गवासी हुए या थककर निराश हो स्कूल को छोड़ बैठे। ऐसे समय में निराश मास्टरों ने तहसील फाजिल्का के, चौटाला और रामनगर (पुरानी आबादी श्रीगंगानगर) तथा दीनगढ़ आदि के प्रमुख लोगों ने 18.12.1932 को एक सभा बुलाई जिसमें मुझे भी निमंत्रित किया गया था। सभा में फैसला किया गया कि स्कूल को छात्रावास के लिये स्टेट स्कूल, संगरिया को दे दिया जावे और पढने के लिये तो स्टेट स्कूल है ही । मेरे जैसे उधार मांगकर लाये हुए व्यक्ति के लिये यह बात बिल्कुल अटपटी थी। आखिर इसे तोड़ना ही था तो मेरे जैसे व्यक्ति को बुलाने की क्या आवश्यकता थी। अततः फैसला हुआ कि यदि मैं समय दे सकूं तो सभी लोग मेरी पूरी सहायता करेंगे। मैने कुछ विचार किया और ‘हां’ भर ली।’’ शब्द की चोट ने चै.बहादुर सिंह भोभिया से स्कूल स्थापित करवाया और ऐसी ही चोट ने स्वामी केशवानंद से स्कूल का विकास करवाया। सन् 1932 में स्वामी जी ने एक मिडिल स्कूल की बागडोर संभाली थी। चालीस वर्ष तक उस स्कूल के विकास के लिये तपस्या की। उनके देहवसान के समय तक उनके द्वारा संगरिया में कई उच्च विद्यालय और महाविद्यालय, क्षेत्र में कई छात्रावास, साहित्य-सदन, पुस्तकालय-वाचनालय और दुर्गम्य ग्रामीण अंचल में 287 विद्यालय भी स्थापित किये।